जानिए, जीएसटी का कौन सा तरीका है ज्यादा फायदेमंद- नेट जीएसटी या ग्रॉस लायबिलिटी

नई दिल्ली। गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) को भारत में 1 जुलाई 2017 को लागू किया गया। जीएसटी ने उन तमाम अप्रत्यक्ष करों की जगह ले ली है, जिन्हें केंद्र और राज्य सरकारें समय-समय पर लगाया करती थीं। इस प्रणाली ने भारत में टैक्स का सारा परिदृश्य ही बदल दिया है। जीएसटी लागू करने की मंशा -एक राष्ट्र, एक टैक्स के सिस्टम को लागू करना था और साथ ही साथ बिजनेस करने की प्रणाली में सुधार लाना भी। इसका उद्देश्य करदाताओं के लिए टैक्स अदा करने की प्रणाली को सुगम बनानाऔर अधिक पारदर्शिता लाना था। इससे आम आदमी का टैक्स का बोझ निश्चित रूप से कम होगा। जीएसटी काउंसिल और केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) ने करदाताओं और कारोबारियों के आसानी से नई करप्रणाली अपनाने में काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है और उनकी समस्याओं का समाधान किया है। बिजी इंफोटेक प्राइवेट लिमिटेड के सहसंस्थापक और निदेशक राजेश गुप्ता जीएसटी में लगातार बदलाव किए जा रहे हैं और टैक्स प्रणाली को सरल बनाने के लिए जीएसटी के कई हिस्सों का फिर से अध्ययन किया जा रहा है। इसके लिए टैक्स प्रणाली के कठिन मुद्दों का भीसमाधान निकाला जा रहा है। हालांकि जीएसटी के कुछ प्रावधान अब भी जटिल है, इसमें सुधार के लिए उपयुक्त कार्रवाई करने की जरूरत है।


टैक्स में अनिश्चितता बरकरार
जीएसटी को लागू हुए करीब ढाई वर्ष गुजर चुके है, लेकिन अभी भी भ्रम बना हुआ है। करदाताओं में टैक्स फाइल करने और रिटर्न भरने में अनिश्चितता बरकार है। हाल ही में कई रजिस्टर्ड करदाताओं को जीएसटीआर 3 बी रिटर्न फाइल करने में देरी पर ग्रॉस लायबिलिटी पर ब्याज चुकाने के लिए नोटिस मिला है। अगर वह समय पर ऐसा करने में नाकाम रहे तो धारा 79 के तहत विभाग रिकवरी की प्रक्रिया शुरू करेगा। इसके कारण कई रजिस्टर्ड करदाताओं में ब्याज के हिसाब को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा हो गयी है।


जीएसटी 1 टैक्स की देनदारी
फरवरी 2020 में केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर और सीमा शुल्क बोर्ड (सीबीआईसी) ने जीएसटी अधिकारियों से जीएसटीके देरी से किए गए भुगतान के लिए करीब 46 हजार करोड़ का ब्याज एकत्र करने के लिए कहा। जीएसटी अधिकारियों के अनुसार इससे बड़े पैमाने पर टैक्स से जुड़ी मुकदमेबाजी शुरू हो सकती है और करदाताओं को काफी परेशानी हो सकती है। जीएसटी का आकलन है कि विभिन्न कारोबारियों (ऐसे व्यापारियों को छोड़कर, जिनका टर्नओवर 1.5 करोड़ रुपये हैं और जिन्होंने कंपोजिट स्कीम का विकल्प अपनाया है) को महीने में 2 बार रिटर्न फाइल करने की जरूरत पड़ती है। इसमें जीएसटीआर 1 में कुल कितना टैक्स देना है, यह दिखाया जाता है, जबकि जीएसटीआर 3 बी (वास्तविक टैक्स पेमेंट) दिखाया जाता है। नियम के अनुसार जीएसटीआर 1 को हर महीने के 11वें दिन भरा जाता है, जबकि जीएसटीआर 3 बी को महीने के 20वें दिन भरा जाता है। कईबारतोकरदाताओं ने तय तारीख के बाद देर से भी ब्याज के बिना टैक्स का भुगतान किया है। नया आदेश इसी मुद्दे को सुलझाने के लिए आया है।


टैक्स रिटर्न देर से फाइल करने पर ब्याज
बोर्ड ने स्पष्ट कानून का उल्लेख किया है कि ब्याज देयता देरी से किए गए टैक्स भुगतान पर बनती है, चाहे वह कैश से किया गया हो या इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) से। दूसरे शब्दों में ब्याज का भुगतान कुल कर देयता के आधार पर किया जाता है, जैसे कि जीएसटीआर 3 बी में दिखाया गया है। हालांकि टैक्स रिटर्न देर से फाइल करने पर ब्याज नेट जीएसटी पर नहीं लगाया जाता है। इसे सकल जीएसटी पर लगाया जाता है। इसमें प्रक्रियागत गड़बड़ी होने पर करदाताओं को काफी ज्यादा बोझ पड़ जाता है। एक तरफ सकल राशि पर जुर्माना लगाने से करदाताओं पर बोझ बढ़ता है। इसी के साथ यह देश की अर्थव्यवस्था और सरकार दोनों के लिए लाभदायक है। यहां इसके कुछ लाभ दिए गए हैं।

  • सकल जीएसटी पर जुर्माना करदाताओं को टैक्स रिटर्न बिना किसी देरी के टाइम पर भरने के लिए प्रेरित करेगा। उस समय उन्हें जुर्माने के रूप में अधिक राशि देने की जरूरत नहीं पड़ेगी। यह नेटजीएसटीकी देयता पर दिए गए ब्याज की राशि से ज्यादा होगी।
  • अगर कारोबारी ठीक समय से जीएसटी फाइल करेंगे तो उनकी बिजनेस की रेटिंग में सुधार आएगा।
  • इससे उन्हें अपने कैश फ्लो को बेहतर तरीके से मैनेज करने में मदद मिलेगी, जिससेकरदाता अपने कारोबार पर ज्यादा कंट्रोल रखने में सफल होंगे।
  • अर्थव्यवस्था की बेहतरी के लिए इसमें कारोबारियों की कार्यप्रणाली में और ज्यादा अनुशासन आएगा।
  • इससे कारोबारियों को अपने उपभोक्ताओं के साथ बेहतर संबंध बनाने में मदद मिलेगी।

यह निश्चित रूप से सरकार की ओर से की गई कड़ी कारर्वाई है। इससे गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) की देरी से किए जा रहे भुगतान पर ब्याज लेने से सरकार को ज्यादा राजस्व हासिल करने में सफलता मिलेगी और अर्थव्यवस्था को भी फलने-फूलने में मदद मिलेगी। इससे करदाता बेहतर तरीके से अपने करों का प्रबंधन कर सकेंगे और इससे उनमें अनुशासन आएगा। इससे वह अपना रिटर्न समय पर फाइल करने के प्रति ज्यादा जिम्मेदार बनेंगे।



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