Coronavirus Lockdown में E-Commerce Companies फेल, आंकड़ों में समझिए पूरा खेल
नई दिल्ली। संकट की इस घड़ी में लोगों को जिन चीजों को सबसे ज्यादा जरुरत है वो हैं खाने-पीने की वस्तुएं और रोजमर्रा के जरुरी सामान। सरकार ने इन चीजों की दुकानों को बंद नही किया है और इसलिए अभी तक कोई खास परेशानी इस मोर्चे पर नही दिखी है। ई-कॉमर्स कंपनियां तो चावल-दाल से लेकर हर जरुरी समान बेचने का दावा करती है, लेकिन बंदी के इस दौर में इनकी हकीकत सामने आ गई है।
देश के गली-मोहल्लों, सोसायटी में चल रहे दुकानों ने बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों को लॉकडाउन के पहले हफ्ते में पीछे छोड़ दिया है। आंकड़ों की बात करें तो देश में 2019-20 में खाद्य और परचून के सामान की सालाना बिक्री 550 अरब डॉलर रही थी। जिसका बड़ा हिस्सा ई-कॉमर्स कंपनियों के पास है, लेकिन लाकडाउन में इन कंपनियों ने अपने हाथ खड़े कर दिए। क्योंकि इनका विस्तार ज्यादातर बड़े शहरों में ही है। वही छोटे दुकानदारों ने इस समय में लोगों को हर जरुरत का समान मुहैया कराकर मिशाल पेश की है।
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ई- कॉमर्स फिसड्डी क्यों?
- केवल महानगरों को में इनका नेटर्वक पूरी तरह से कर रहा है काम।
- खाद्य और किराना उत्पादों की 80 फीसदी हिस्सेदारी केवल 6 शहरों से।
- इलेक्ट्रॉनिक और गैर जरुरी सामानों की हिस्सेदारी ज्यादा।
- प्राथमिकता सूची में खाद्य और किराना शामिल नहीं।
- बिग बाजार जैसे संगठित किराना स्टोर का बंद होना।
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जानिए ई- कॉमर्स में कितनी ग्रोसरीज की हिस्सेदारी
| वस्तुएं | कारोबार |
| खाद्य सामग्री | 2.5 अरब डॉलर |
| दवाएं | 10 करोड़ डॉलर |
| इलेक्ट्रानिक समान | 13 अरब डॉलर |
| परिधान | 2.5 अरब डॉलर |
छोटे दुकानदारों ने संभाली कमान
दरअसल ई-कॉमर्स कंपनियों ने खाद्य और जरुरी समानों की कम हिस्सेदारी के चलते लाकडॉउन के पहले हफ्ते में ही हाथ खींच लिए तब छोटे परचून और किराना दुकानदारों ही इस सकंट की घड़ी में लोगो के घर में समान मुहैया कर रहे हैं।
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देश में किराना दुकानों की स्थिति
- देश में करीब 1.1 करोड़ छोटी-बड़ी खुदरा दुकानें
- करीब 3 लाख से अधिक वितरक और थोक विक्रेता
- खाद्य और परचून की बिक्री में ई-कामर्स की भागीदारी महज 1.04 फीसदी
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